Azadi Ke Rakhvale: सरदार भगत सिंह आजाद को एक दिन पहले फांसी क्यों दी गयी

Guardians of Freedom: Why was Sardar Bhagat Singh hanged a day earlier?

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Azadi Ke Rakhvale: हमारे आज़ादी के रखवाले शहीदे आज़म भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव सिंह को 23 मार्च, 1931 को तय समय से एक दिन पहले ही लाहौर की सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गयी थी। जेल की नियमानुसार शाम के वक्त कभी भी फांसी नहीं दी जाती है। मगर अंग्रेज इतने डरे हुए थे कि उन्होंने तय दिन से एक रोज पहले शाम को भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी।

Azadi Ke Rakhvale: भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी क्यों दी गई थी?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को 23 मार्च 1931 को ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जॉन सॉन्डर्स की हत्या के आरोप में फांसी दी गई थी, जो कि लाला लाजपत राय की मौत का बदला लेने के लिए किया गया था, और इस मामले को ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें उन्हें ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे के साथ फांसी पर चढ़ाया गया था।Guardians of Freedom: Why was Sardar Bhagat Singh hanged a day earlier?

Azadi Ke Rakhvale: फांसी का मुख्य कारण क्या था।

1. लाला लाजपत राय की मौत का बदला: 1928 में साइमन कमीशन के विरोध प्रदर्शन के दौरान ब्रिटिश पुलिस अधिकारी जे.पी. स्कॉट (SP Scott) के लाठीचार्ज में लाला लाजपत राय गंभीर रूप से घायल हो गए थे और बाद में उनकी मृत्यु हो गई थी।
2. जॉन सॉन्डर्स की हत्या: क्रांतिकारियों ने स्कॉट से बदला लेने की योजना बनाई, लेकिन गलती से उन्होंने असिस्टेंट सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (ASP) जॉन सॉन्डर्स को गोली मार दी, जिसे उन्होंने स्कॉट समझ लिया था। इसी हत्या के आरोप में उन्हें फांसी हुई।

Azadi Ke Rakhvale: फांसी कब, कैसे और कहाँ दी गयी

1. 23 मार्च 1931 को लाहौर सेंट्रल जेल में भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी दी गई।
2. फांसी से पहले उन्होंने ‘इंकलाब जिंदाबाद’ के नारे लगाए और देश के लिए अपनी शहादत दी।
3. यह दिन भारत में शहीद दिवस के रूप में मनाया जाता है।

Azadi Ke Rakhvale: भगत सिंह को फांसी किसकी गवाही पर हुई थी?

भगत सिंह और उनके साथियों को फाँसी मुख्य रूप से जय गोपाल, हंसराज बोहरा, और फणींद्रनाथ घोष जैसे सरकारी गवाहों (Informers) की गवाही के आधार पर हुई थी, जिन्होंने ब्रिटिश सरकार के सामने क्रांतिकारियों की गतिविधियों और सांडर्स हत्याकांड में उनकी भूमिका के बारे में जानकारी दी थी, जिससे स्पेशल ट्रिब्यूनल ने उन्हें दोषी ठहराया था।

1. जय गोपाल: यह वह गवाह था जो सांडर्स की हत्या के समय भगत सिंह के साथ मौजूद था और उसने हत्याकांड में भगत सिंह की संलिप्तता की गवाही दी, जिसके लिए उसे इनाम भी मिला।
2. फणींद्रनाथ घोष (घोष): इन्होंने भी सरकारी गवाह बनकर क्रांतिकारियों के खिलाफ अहम गवाही दी।
3. हंसराज बोहरा: यह भी एक मुख्य गवाह था जिसने क्रांतिकारी गतिविधियों की जानकारी ब्रिटिश अधिकारियों को दी।
4. मनमोहन बनर्जी: यह भी सरकारी गवाह बनने को राजी हुए और उन्होंने भी जानकारी मुहैया कराई।
5. शोभा सिंह: इन्होंने असेम्बली में बम फेंकने के बाद गवाही दी थी, हालांकि उनके पिता एक प्रभावशाली बिल्डर थे।

कैसे हुई फाँसी?

इन गवाहों की गवाहियों और अन्य सबूतों के आधार पर, लाहौर षडयंत्र केस की सुनवाई करने वाले स्पेशल ट्रिब्यूनल ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फाँसी की सज़ा सुनाई थी। इन लोगों ने ब्रिटिश जांचकर्ताओं को क्रांतिकारियों की योजनाओं और गतिविधियों के बारे में विस्तार से बताया था।

उस जज का नाम क्या था जिसने अपना इस्तीफा दे दिया लेकिन भगत सिंह को फांसी नहीं लिखी थी?

सैयद आगा हैदर एक महान व्यक्तित्व थे जिन्होंने भगत सिंह को फांसी की सजा नहीं सुनाई, बल्कि भगत सिंह के मामले में फैसला सुनाने से इनकार कर दिया और अपना इस्तीफा दे दिया था। वह एक न्यायाधीश थे जिन्होंने अपने सिद्धांतों और नैतिकता के लिए खड़े होने का फैसला किया।Guardians of Freedom: Why was Sardar Bhagat Singh hanged a day earlier?

गांधी ने भगत को क्यों नहीं बचाया?

ब्रिटिश सरकार भी भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने में जल्दबाजी नहीं कर रही थी, लेकिन गांधी और नेहरू को इसकी सख्त जरूरत थी, क्योंकि भगत सिंह भारत की जनता में तेजी से लोकप्रिय हो रहे थे, जो गांधी और नेहरू को बिलकुल भी पसंद नहीं था । यही कारण था कि वे चाहते थे कि भगत सिंह को जल्द से जल्द फांसी दी जाए।

भगत सिंह मरते समय क्या कहा था?

मरते समय भगत सिंह ने कई बातें कहीं, जिनमें मुख्य रूप से “इंकलाब जिंदाबाद” का नारा, क्रांति के सपनों को पूरा करने की इच्छा और “हम मर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां आजाद हवा में सांस ले सकें” जैसे प्रेरणादायक शब्द शामिल हैं, साथ ही उन्होंने फांसी से पहले लेनिन की जीवनी पढ़ने की बात कही और अपनी अंतिम इच्छा बताई थी कि उन्हें गोली मारी जाए, न कि फाँसी दी जाए.Guardians of Freedom: Why was Sardar Bhagat Singh hanged a day earlier?

मुख्य बातें:

इंकलाब जिंदाबाद!”: यह उनका अंतिम और सबसे प्रसिद्ध नारा था, जिसे उन्होंने फांसी के तख्ते पर चढ़ते समय बुलंद आवाज़ में लगाया था.

“हम मर रहे हैं ताकि आने वाली पीढ़ियां आजाद हवा में सांस ले सकें”: यह उनका बलिदान का उद्देश्य बताता था कि उनका जीवन देश की आजादी और भविष्य की पीढ़ियों के लिए है.
“इंकलाबियों को मरना ही होता है”: उन्होंने यह भी कहा था कि क्रांतिकारियों को बलिदान देना ही पड़ता है, और वे इस अंतिम परीक्षा के लिए उत्सुक थे.
लेनिन की जीवनी: फांसी से पहले वे लेनिन की जीवनी पढ़ रहे थे और चाहते थे कि उसे पूरा करने का समय मिले, जो उनकी बौद्धिक जिज्ञासा और क्रांतिकारी विचारों को दर्शाता है.
अंतिम इच्छा: उन्होंने दया की अपील नहीं की, लेकिन उन्होंने यह इच्छा व्यक्त की थी कि उन्हें फाँसी के बजाय गोलियों से उड़ा दिया जाए, जो पूरी नहीं हुई.
इन शब्दों और कार्यों से भगत सिंह ने यह साबित किया कि वे मौत से नहीं डरते थे, बल्कि अपने देश के लिए एक स्वतंत्र और न्यायपूर्ण भारत का सपना संजोए हुए थे, जिसके लिए वे हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने के लिए तैयार थे.

भगत सिंह की अंतिम इच्छा क्या थी?

लेकिन एक शर्त पर जिंदा रह सकता हूँ,कि मैं कैद होकर या पाबन्द होकर जीना नहीं चाहता। मेरा नाम हिन्दुस्तानी क्रांति का प्रतीक बन चुका है और क्रांतिकारी दल के आदर्शों और कुर्बानियों ने मुझे बहुत ऊँचा उठा दिया है- इतना ऊँचा कि जीवित रहने की स्थिति में इससे ऊँचा मैं हर्गिज नहीं हो सकता।

भगत सिंह को फांसी सुनाने वाले जज का क्या नाम था?

भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को फांसी की सज़ा सुनाने वाले स्पेशल ट्रिब्यूनल में तीन जज थे: जस्टिस जी.सी. हिल्टन (G.C. Hilton), जस्टिस ए. आर. हिल (A.R. Haul), और जस्टिस कोल्डस्ट्रीम (Coldstream); हालाँकि, भारतीय जज सैय्यद आगा हैदर (Syed Agha Haider) ने फांसी की सज़ा सुनाने से इनकार कर दिया और इस्तीफा दे दिया था, जबकि ब्रिटिश जजों ने फैसला सुनाया. 

  • ट्रिब्यूनल के सदस्य:
    लाहौर षडयंत्र मामले की सुनवाई के लिए एक विशेष ट्रिब्यूनल बनाया गया था, जिसमें जी.सी. हिल्टन, ए.आर. हिल और आगा हैदर शामिल थे.
    आगा हैदर का रुख:
    जज आगा हैदर ने भगत सिंह के मामले में निष्पक्ष सुनवाई की मांग की और जब उन पर दबाव डाला गया, तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया, क्योंकि वे फांसी की सज़ा नहीं देना चाहते थे.

    अंतिम फैसला:
    आगा हैदर के इस्तीफे के बाद, ब्रिटिश जजों ने ही भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को मौत की सज़ा सुनाई.
    जल्लाद:
    फांसी देने वाले जल्लाद का नाम काला मसीह था, जिसने 23 मार्च 1931 को भगत सिंह को फांसी दी थी.

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