Ballia UP News: लेखक अभिषेक मिश्रा की कविता “गणतंत्र का नया व्याकरण” आज के भारत की बदलती चेतना और युवाओं की वैचारिक भूमिका को सशक्त शब्द देती है। यह रचना परंपरागत राष्ट्रगान-भाव से आगे बढ़कर संविधान, तिरंगे और नागरिक दायित्वों को आधुनिक संदर्भ में पुनर्परिभाषित करती है।
कविता में जहाँ एक ओर तिरंगे के तीनों रंग शौर्य, शांति और आत्मनिर्भरता के प्रतीक बनकर उभरते हैं, वहीं दूसरी ओर डिजिटल युग, नवाचार, स्टार्टअप संस्कृति और वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका को भी संवेदनशीलता के साथ रेखांकित किया गया है। यह कविता उस युवा भारत की आवाज़ है, जो केवल इतिहास का गर्व नहीं, बल्कि वर्तमान की ज़िम्मेदारी और भविष्य की दिशा तय करना चाहता है।
“गणतंत्र का नया व्याकरण” आज के नागरिक से सवाल भी करता है और रास्ता भी दिखाता है—जहाँ देशभक्ति केवल प्रतीकों तक सीमित नहीं, बल्कि सत्य, परिश्रम और संवैधानिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता बन जाती है। यह रचना 26 जनवरी के अवसर पर एक नया, फ्रेश और विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत करती है, जो पाठक को सोचने, समझने और जुड़ने के लिए प्रेरित करती है।
यह कविता उस भारत की अभिव्यक्ति है जो खेतों से लेकर अंतरिक्ष तक, परंपरा से लेकर तकनीक तक और भावना से लेकर कर्म तक—हर मोर्चे पर आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ रहा है।
शीर्षक: गणतंत्र का नया व्याकरण
न मैं शब्दों का सौदागर, न मैं कोई नेता हूँ,
मैं सदियों की ख़ामोशी का, गहरा सन्नाटा हूँ।
मैं वो पन्ना हूँ संविधान का, जो अब तक अधूरा है,
मैं वो सपना हूँ आज़ादी का, जो न आधा न पूरा है।
तुम जश्न मनाते ऊँचाई पर, मैं नींव की ईंटें ढोता हूँ,
तुम फहराते हो झंडा, मैं उम्मीदें लेकर बोता हूँ।
गणतंत्र तभी गरजेगा जब, कोई द्वार अंधेरे में न हो,
इन्साफ़ की पावन राहों में, कोई रुकावट घेरे में न हो।
अब इतिहास के बासी पन्नों पर, मैं स्याही नहीं बहाऊँगा,
मैं वर्तमान की मुट्ठी में, अपना भविष्य सजाऊँगा।
यही भविष्य अब भारत की, नई परिभाषा लिखेगा,
नभ की हर एक ऊँचाई पर, अब मेरा तिरंगा दिखेगा!
मेरा तिरंगा अब सिर्फ़ अम्बर का, शृंगार नहीं कहलाता,
ये महाशक्ति बन चुके भारत का, ‘विजय-पत्र’ है कहलाता।
केसरिया अब शौर्य की सीमा, तोड़ आगे बढ़ जाता है,
सफ़ेद अब ‘शांति-शक्ति’ का, नया व्याकरण सिखाता है।
हरा अब महज़ हरियाली नहीं, ‘आत्मनिर्भर’ का वादा है,
और चक्र की ये चौबीस तीलियाँ, ‘विश्व-गुरु’ का इरादा है!
जहाँ ‘डिजिटल’ और ‘धर्म’ का, अद्भुत संगम देखा जाता,
वहाँ भारत की सामर्थ्य का, अब नया अध्याय लिखा जाता।
कल तक जो महज़ एक बाज़ार था, आज वो ‘नवाचार’ है,
मेरा युवा अब ‘स्टार्टअप’ से, करता सपनों का सत्कार है।
अब सिर्फ़ खेतों की मिट्टी नहीं, अंतरिक्ष की धूल उड़ाते हैं,
हम वो भारत हैं जो ‘संकट’ में भी, ‘अवसर’ खोज लाते हैं।
मैं नया दौर, मैं नया लहू, मैं नई आग का नाम हूँ,
मैं कल का उजला सूरज, और आज का इंकलाब हूँ।
मैं भूल नहीं दोहराऊँगा, मैं खुद मशाल बन जाऊँगा,
मैं मिट्टी का क़र्ज़ चुकाकर, असली हिन्दुस्तानी कहलाऊँगा।
मैं रुकूँगा नहीं, मैं थकुँगा नहीं, मैं सत्य का एक सिपाही हूँ,
मैं अपने वतन की बदलती मिट्टी की, लिखी हुई गवाही हूँ।
मेरी रग-रग में दौड़ रहा, मेरे पूर्वजों का ‘मान’ है,
मेरा हर शब्द अब भारत की, ‘जीत’ का नया अभियान है!
मैं हर अधूरे पन्ने पर, अब ‘विजय-गाथा’ लिख जाऊँगा,
मैं जीऊँ तो वतन के लिए, और वतन के लिए ही मिट जाऊँगा।
इन्हीं लफ़्ज़ों के साथ अब, मैं अपनी कलम को रोकता हूँ,
मैं इस वतन की पावन मिट्टी को, सौ बार सलामी ठोकता हूँ!
जय हिन्द! जय भारत!
लेखक: अभिषेक मिश्रा ‘बलिया’
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