UGC Act 2026: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की स्थापना का मूल उद्देश्य शिक्षा के क्षेत्र में समानता, सामाजिक न्याय और वंचित वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करना था। यह संस्था इसलिए अस्तित्व में आई थी ताकि ऐतिहासिक रूप से उपेक्षित समुदायों—अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)—को उच्च शिक्षा में वह अवसर मिल सके, जिससे उन्हें संविधान प्रदत्त समानता और गरिमा का अधिकार प्राप्त हो। किंतु आज की स्थिति यह दर्शाती है कि यही उद्देश्य व्यवस्थित रूप से कमजोर किए जा रहे हैं।
देश के अनेक विश्वविद्यालयों में आरक्षित पदों को जानबूझकर वर्षों तक खाली रखा जा रहा है। प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर जैसे स्थायी पदों पर नियुक्तियाँ नहीं की जा रहीं, जबकि उसी कार्य को एडहॉक और गेस्ट फैकल्टी के माध्यम से कराया जा रहा है—जहाँ आरक्षण का पूर्णतः निषेध कर दिया गया है। यह न केवल संवैधानिक भावना के विरुद्ध है, बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 का खुला उल्लंघन भी है।
रोस्टर प्रणाली से छेड़छाड़ कर आरक्षण को निष्प्रभावी बनाना आज एक सामान्य प्रशासनिक रणनीति बन चुकी है। विभागीय स्तर पर पदों का विखंडन, विषयों का पुनर्गठन और अस्थायी नियुक्तियों का विस्तार—ये सभी उपाय सुनियोजित ढंग से SC, ST और OBC वर्ग को उच्च शिक्षा में निर्णायक भूमिका से वंचित करने के प्रयास हैं। साथ ही, स्कॉलरशिप और फेलोशिप में अनावश्यक देरी या उन्हें रोक देना छात्रों को मानसिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से तोड़ने का कार्य करता है।
विडंबना यह है कि जो शक्तियाँ कल तक SC-ST-OBC समाज को “हिंदू बनो” का उपदेश देती थीं, “जात-पात छोड़ो, हम हिंदू-हिंदू भाई-भाई” जैसे नारे लगाती थीं और हिंदू राष्ट्र की दुहाई देती थीं, वही शक्तियाँ आज हिंदू होने के नाम पर UGC और विश्वविद्यालयों में SC-ST-OBC के संवैधानिक अधिकारों का विरोध कर रही हैं। प्रश्न अत्यंत स्पष्ट है—क्या SC, ST और OBC हिंदू नहीं हैं? यदि वे हिंदू हैं, तो फिर हिंदुत्व के नाम पर उनके अधिकारों का हनन क्यों?
शिक्षा केवल डिग्री प्राप्त करने का साधन नहीं है। यह व्यक्ति को आत्मसम्मान, गरिमा और सामाजिक भागीदारी का अधिकार देती है। किसी भी लोकतांत्रिक समाज की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसकी शिक्षा व्यवस्था कितनी समावेशी, न्यायपूर्ण और संवेदनशील है। यदि विश्वविद्यालयों में ही भेदभाव, उत्पीड़न और संस्थागत अन्याय व्याप्त हो, तो समाज में समानता और न्याय की कल्पना करना केवल एक छलावा बनकर रह जाता है।
आज आवश्यकता किसी कानून को समाप्त करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की है कि मौजूदा कानूनों और दिशानिर्देशों को और अधिक प्रभावी तथा न्यायसंगत बनाया जाए। यदि कोई छात्र किसी अन्य छात्र के साथ धनबल, बाहुबल या सामाजिक प्रभुत्व के आधार पर उत्पीड़न करता है, तो उसके विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। यह नियम किसी एक जाति या वर्ग के विरुद्ध नहीं, बल्कि सभी छात्रों की सुरक्षा और सम्मान के लिए है।
अक्सर यह भ्रम फैलाया जाता है कि ऐसे कानून और दिशानिर्देश केवल दलित, पिछड़े या वंचित वर्गों के हित में होते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि इन प्रावधानों से अनारक्षित वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के छात्रों को भी संरक्षण मिलता है। उत्पीड़न किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होता, किंतु ऐतिहासिक कारणों से कुछ वर्ग इसके अधिक शिकार रहे हैं। इसलिए समानता का अर्थ यह नहीं कि सभी के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाए, बल्कि यह है कि जिसे जितनी आवश्यकता हो, उसे उतना संरक्षण प्रदान किया जाए।
यह कहना कि UGC किसी विशेष वर्ग के विरुद्ध कार्य कर रही है, तथ्यात्मक रूप से भ्रामक है। रोहित वेमुला प्रकरण के बाद, सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों के अंतर्गत किए गए सर्वेक्षणों, समितियों और अध्ययनों के आधार पर ही अनेक निर्णय लिए गए हैं। ऐसे में UGC की नीयत पर प्रश्नचिह्न लगाना संस्थागत ईमानदारी को कमजोर करने का प्रयास है। असली प्रश्न यह है कि विश्वविद्यालय स्तर पर इन दिशानिर्देशों को लागू क्यों नहीं किया जा रहा।
इस विमर्श का उद्देश्य सवर्ण समाज के अधिकारों को छीनना या उनके साथ भेदभाव करना नहीं है। इसका एकमात्र लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि विश्वविद्यालयों, स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थानों में पिछड़े, दलित, वंचित और कमेरा वर्ग के छात्रों के साथ हो रहे संस्थागत और सामाजिक शोषण का अंत हो। संविधान ने शिक्षा का अधिकार सभी नागरिकों को दिया है—और इस अधिकार में सम्मान के साथ पढ़ने, हॉस्टल में रहने और बिना भय के आगे बढ़ने का अधिकार भी शामिल है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में आज भी OBC वर्ग के छात्रों को हॉस्टल में पूर्ण आरक्षण नहीं मिल पाता। यह स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब यह ज्ञात हो कि अनेक हॉस्टल पिछड़े वर्ग के करदाताओं के पैसे से बने हैं। वर्षों से छात्र इस अन्याय के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं, किंतु अब तक उन्हें उनका संवैधानिक अधिकार नहीं मिल सका है।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या विश्वविद्यालयों के निर्माण में केवल कुछ गिने-चुने लोगों का ही योगदान था? क्या देश के लिए बलिदान देने वाले शहीदों के बच्चे शिक्षा से वंचित रहेंगे? क्या बनारस के स्थानीय निवासी, उत्तर प्रदेश, बिहार और देशभर के पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों के बच्चों का इन विश्वविद्यालयों पर कोई अधिकार नहीं है?
क्या ये बच्चे डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर या कुलपति नहीं बन सकते? क्या कमेरा वर्ग का भाग्य केवल खेतों में काम करने, औज़ार उठाने और पशुपालन तक ही सीमित है? यह सोच न केवल अमानवीय है, बल्कि संविधान की आत्मा के भी विरुद्ध है। विश्वविद्यालय किसी एक वर्ग की बपौती नहीं होते; वे ज्ञान के ऐसे केंद्र होते हैं जहाँ हर वर्ग, हर समुदाय और हर विचार को स्थान मिलना चाहिए।
यदि इन छात्रों के साथ उत्पीड़न होता है, तो उनकी आवाज़ कौन उठाएगा? जब संस्थाएँ मौन धारण कर लेती हैं, तब समाज की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। दुर्भाग्यवश, आज अधिकांश सरकारें और संगठन अपने निजी हितों और सत्ता समीकरणों में उलझे हुए हैं, जिससे वंचित वर्गों के छात्रों के लिए न्याय की लड़ाई और कठिन हो जाती है।
यह भी गंभीर विचार का विषय है कि क्या देश की संपत्ति और संसाधनों पर केवल एक प्रतिशत लोगों का अधिकार होगा? क्या अडानी-अंबानी जैसे कुछ नाम ही समृद्धि के प्रतीक बनेंगे, और शेष समाज शिक्षा, अवसर और संसाधनों से वंचित रहेगा? क्या आदिवासी, पहाड़ी और हाशिए पर खड़े समुदायों के बच्चों का विश्वविद्यालयों में कोई स्थान नहीं होगा?
न्याय का वास्तविक अर्थ यही है कि शिक्षा के द्वार सभी के लिए खुले हों—बिना भय, बिना भेदभाव और बिना अपमान के। जब तक विश्वविद्यालयों में समानता, सामाजिक न्याय और छात्र अधिकारों को पूरी ईमानदारी से लागू नहीं किया जाएगा, तब तक सामाजिक न्याय केवल कागज़ों तक सीमित रहेगा।
अंततः, यह संघर्ष किसी के विरुद्ध नहीं, बल्कि सभी के अधिकारों के पक्ष में है। शिक्षा में न्याय सुनिश्चित करना ही एक सशक्त, संवेदनशील और लोकतांत्रिक भारत की सच्ची आधारशिला है।
Author: UP Tak News
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