Jantar Mantar Student Protest: 20 जुलाई को नीट-यूजी धांधली के खिलाफ छात्रों के ‘संसद मार्च’ के दौरान हुए लाठीचार्ज के वीडियो से गहराया विवाद; दिल्ली हाईकोर्ट ने केंद्र व दिल्ली पुलिस को जारी किया कारण बताओ नोटिस, सीसीटीवी फुटेज सुरक्षित रखने के निर्देश।
नई दिल्ली: 20 जुलाई 2026 को राजधानी दिल्ली के जंतर-मंतर पर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं (विशेषकर नीट-यूजी) में अनियमितताओं और धांधली के विरोध में छात्रों और युवाओं का ‘संसद मार्च’ (CJP प्रदर्शन) आयोजित किया गया था। इस प्रदर्शन के दौरान पुलिस कार्रवाई, आंसू गैस के गोलों और व्यापक लाठीचार्ज के कई वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे हैं।
इन वीडियो में विशेष रूप से पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा महिला छात्रों पर बल प्रयोग करने, पीछे से लाठी चलाने और बिना किसी पूर्व चेतावनी या उद्घोषणा के अचानक कार्रवाई करने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं। इस घटनाक्रम का संज्ञान लेते हुए दिल्ली हाईकोर्ट ने जनहित याचिकाओं (PIL) पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।
Jantar Mantar Student Protest: दिल्ली हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी और निर्देश
दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायाधीश तेजस काजला की पीठ ने याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कहा कि यह कोई ऐसी पृथक या मामूली घटना नहीं है जिसे नजरअंदाज किया जा सके।
Jantar Mantar Student Protest: सीसीटीवी और वीडियो सुरक्षित रखने के आदेश
अदालत ने दिल्ली पुलिस और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि 20 जुलाई की पूरी घटना से संबंधित सभी रिकॉर्ड, पुलिस की वीडियोग्राफी और क्षेत्र के सीसीटीवी फुटेज को उनके एसओपी (SOP) के तहत सुरक्षित रखा जाए।
क्या है याचिकाकर्ताओं का पक्ष
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मौलिक मांगों को लेकर संसद की ओर बढ़ रहे छात्रों पर अत्यधिक और असंगत बल का प्रयोग किया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि भीड़ को तितर-बितर करने के लिए तय स्थापित प्रक्रियाओं और न्यूनतम बल प्रयोग के सिद्धांतों का खुलेआम उल्लंघन किया गया।
महिला प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग
कानून और पुलिस मैनुअल क्या कहता है?
भारतीय कानून (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता – BNSS / पूर्ववर्ती CrPC) और राज्य पुलिस मैनुअल में किसी भी सार्वजनिक प्रदर्शन को नियंत्रित करने और विशेष रूप से महिलाओं से निपटने के लिए बेहद स्पष्ट और कड़े दिशानिर्देश दिए गए हैं
1. महिला पुलिसकर्मियों की अनिवार्यता
नियम: किसी भी ऐसे प्रदर्शन में जहाँ महिलाएँ या छात्राएँ शामिल हों, वहाँ पर्याप्त संख्या में महिला पुलिसकर्मियों (Female Police Personnel) की तैनाती अनिवार्य है।
उल्लंघन का आरोप: जंतर-मंतर के वायरल वीडियो और चश्मदीदों के दावों के अनुसार, महिला प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने, पीछे धकेलने और उन पर बल प्रयोग करने में पुरुष पुलिसकर्मी आगे दिखाई दिए, जो स्थापित पुलिस मैनुअल का सीधा उल्लंघन है।
2. पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा स्पर्श और लाठीचार्ज पर रोक
नियम: आपातकालीन स्थितियों को छोड़कर पुरुष पुलिसकर्मी किसी भी परिस्थिति में महिला प्रदर्शनकारियों को शारीरिक रूप से स्पर्श नहीं कर सकते और न ही उन पर सीधे लाठीचार्ज कर सकते हैं। महिला अधिकारियों की अनुपस्थिति में महिला प्रदर्शनकारी को केवल गंभीर सुरक्षा खतरे की स्थिति में ही रोका जा सकता है।
अमानवीय व्यवहार पर रोक: किसी भी प्रदर्शनकारी (चाहे महिला हो या पुरुष) को पीछे से भागते समय सिर, गर्दन या पीठ के ऊपरी हिस्से पर वार करना कानूनन दंडनीय और असंगत माना जाता है।
3. लाठीचार्ज और बल प्रयोग के एसओपी (SOP)
पुलिस गाइडलाइंस के अनुसार किसी असेंबली या प्रदर्शन को हटाने की एक क्रमिक प्रक्रिया होती है
पूर्व चेतावनी (Proclamation & Warning): लाठीचार्ज या आंसू गैस का उपयोग करने से पहले पुलिस को लाउडस्पीकर के माध्यम से सार्वजनिक रूप से चेतावनी देनी होती है कि सभा गैर-कानूनी घोषित कर दी गई है और उन्हें हटने के लिए समय दिया जा रहा है।
न्यूनतम बल का सिद्धांत (Minimal Force): बल प्रयोग हमेशा केवल भीड़ को पीछे धकेलने के उद्देश्य से होना चाहिए, न कि दंडात्मक (Punitive) कार्रवाई के रूप में।
कमर के नीचे वार: यदि लाठीचार्ज अपरिहार्य हो जाए, तो निर्देश स्पष्ट हैं कि लाठी केवल कमर के निचले हिस्से (पैरों) पर मारी जानी चाहिए ताकि किसी को जानलेवा या गंभीर चोट न लगे।
पुलिस का पक्ष और अन्य प्रतिक्रियाएं
जहाँ एक ओर छात्रों और कानूनी संस्थाओं द्वारा पुलिस की कार्रवाई को अत्यधिक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर प्रशासन और पुलिस का अपना तर्क है।
दिल्ली पुलिस का दावा: सरकार और पुलिस की ओर से पेश विधि अधिकारियों ने अदालत में तर्क दिया कि जंतर-मंतर पर जमा भीड़ ने संसद मार्ग की ओर जाने वाली बैरिकेडिंग को तोड़ा और उग्र रूप धारण कर लिया था। पुलिस के अनुसार, पथराव और हिंसक गतिविधियों के कारण कई पुलिसकर्मी घायल हुए और कई वाहनों को नुकसान पहुँचा।
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) का रुख: सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने एक प्रस्ताव पारित कर छात्रों और कानूनी बिरादरी के सदस्यों पर हुए लाठीचार्ज की कड़े शब्दों में निंदा की है तथा मामले की न्यायिक जांच (Judicial Inquiry) की मांग की है।
आगे क्या?
दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा जारी नोटिस के बाद अब दिल्ली पुलिस को चार सप्ताह के भीतर अपनी विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करनी होगी। इस रिपोर्ट में पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि:
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क्या लाठीचार्ज से पहले निर्धारित कानूनी चेतावनियां दी गई थीं?
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महिला प्रदर्शनकारियों को संभालने के लिए पर्याप्त महिला पुलिस बल तैनात था या नहीं?
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बल प्रयोग के दौरान एसओपी का पालन किस हद तक किया गया?
जंतर-मंतर की इस घटना ने एक बार फिर भारत में नागरिकों के लोकतांत्रिक विरोध प्रदर्शन के अधिकार (अनुच्छेद 19) और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी के बीच के संतुलन पर एक गंभीर कानूनी बहस को जन्म दे दिया है।
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Author: UP Tak News
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