Aravalli Hills: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में हालिया बदलाव से उत्पन्न चिंताओं पर स्वतः संज्ञान लिया है। आशंका है कि इससे अनियंत्रित खनन और गंभीर पर्यावरणीय क्षति हो सकती है। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे के महेश्वरी और जस्टिस ए जी मसीह की वेकेशन बेंच 29 दिसंबर को इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करेगी। यह कदम अरावली के संरक्षण के लिए अहम है।
Aravalli Hills Case: सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों की परिभाषा में हाल ही में हुए बदलाव से उत्पन्न चिंताओं पर स्वत: संज्ञान लिया है। ऐसी आशंका है कि बिना किसी रोक-टोक के माइनिंग और गंभीर पर्यावरणीय नुकसान का रास्ता खुल सकता है।
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जे के महेश्वरी और जस्टिस ए जी मसीह की वेकेशन बेंच सोमवार 29 दिसंबर को इस मामले पर विचार करेगी।
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Aravalli Hills: आखिर पूरा विवाद क्या है
मोदी सरकार के फैसले से पहाड़ों पर बड़ा खतरा! अरावली भारत की सबसे पुरानी पर्वतमाला है… और अब उसी अरावली का 90% हिस्सा एक नए सरकारी नियम की वजह से खतरे में बताया जा रहा है। 100 मीटर से कम ऊँचाई वाले पहाड़ अब ‘अरावली’ ही नहीं माने जाएंगे— यानी बड़े पैमाने पर खनन, निर्माण और पर्यावरण को नुकसान का डर।
Aravalli Hills: विवाद के प्रमुख बिंदु निम्नलिखित हैं
1. नई परिभाषा (100 मीटर का नियम): सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की समिति की सिफारिश को स्वीकार करते हुए तय किया है कि अब केवल उन्हीं भू-आकृतियों को ‘अरावली पहाड़ी’ माना जाएगा जिनकी ऊंचाई स्थानीय जमीनी स्तर से 100 मीटर या उससे अधिक है।
2. पर्यावरणविदों की चिंता: विशेषज्ञों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का तर्क है कि इस परिभाषा के कारण अरावली का लगभग 90% से 99% हिस्सा कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा, क्योंकि अधिकांश पहाड़ियों की ऊंचाई 100 मीटर से कम है।
3. खनन का खतरा: विरोध करने वालों का मानना है कि जो पहाड़ियां इस नई परिभाषा में नहीं आएंगी, वहां अंधाधुंध खनन और निर्माण कार्य शुरू हो जाएंगे। इससे थार मरुस्थल के विस्तार को रोकने वाली प्राकृतिक दीवार कमजोर हो जाएगी और उत्तर भारत में प्रदूषण व जल संकट बढ़ेगा।
4. सरकार का पक्ष: केंद्र सरकार का कहना है कि यह नियम स्पष्टता लाने और अवैध खनन रोकने के लिए बनाया गया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि जब तक सस्टेनेबल माइनिंग (सतत खनन) प्लान तैयार नहीं हो जाता, तब तक नए खनन पट्टे जारी नहीं किए जाएंगे।
5. राजनीतिक और सामाजिक विरोध: राजस्थान के कई जिलों (जैसे अलवर और उदयपुर) में इस फैसले के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और ‘अरावली बचाओ’ अभियान चल रहे हैं। विपक्ष का आरोप है कि यह फैसला खनन माफियाओं को फायदा पहुंचाने के लिए लिया गया है।
ताजा स्थिति: सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल अरावली क्षेत्र में नए खनन पट्टों पर अंतरिम रोक (Interim Moratorium) लगा दी है, जो तब तक प्रभावी रहेगी जब तक पर्यावरण मंत्रालय एक व्यापक प्रबंधन योजना तैयार नहीं कर लेता।
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