Ballia, UP News: बलिया जिले के बैरिया तहसील अंतर्गत श्रीनगर गांव स्थित श्री नाथ लक्ष्मण जूनियर हाई स्कूल आज भी उस शिक्षा पद्धति को जीवंत रखे हुए है, जो कभी भारतीय कक्षाओं की आत्मा मानी जाती थी—ब्लैकबोर्ड, चॉक और ज़मीन पर बिछी चटाइयों पर बैठकर होने वाली पढ़ाई।
हमारी टीम ने विद्यालय का दौरा किया और वहाँ के प्राचार्य गोरखनाथ जी सहित शिक्षकों शिवकुमार, गया प्रसाद, मुस्कान और रूबी से विस्तृत बातचीत की। अत्याधुनिक डिजिटल शिक्षा के इस दौर में जब देशभर के स्कूल सॉफ़्टवेयर, स्मार्ट क्लास और टैब आधारित लर्निंग की ओर बढ़ रहे हैं, यह विद्यालय अपने पारंपरिक स्वरूप में दृढ़ता से खड़ा दिखाई देता है।
शिक्षकों का अनुभव: “पुरानी पद्धति में संवाद है, जुड़ाव है”
शिक्षकों ने बताया कि—
“शिक्षा चाहे किसी भी रूप में हो, उसकी आत्मा संवाद है।
डिजिटल माध्यम सुविधाजनक है, लेकिन बच्चों और शिक्षक के बीच ‘संबंध’ कम कर देता है।
यहाँ ब्लैकबोर्ड पर लिखते हुए हम हर बच्चे की आँखों में उसका ध्यान, उसकी समझ और उसकी उलझनें पढ़ पाते हैं—यही असली कक्षा है।”

शिक्षकों ने यह भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साधनों की सीमित उपलब्धता और नेटवर्क की समस्याएँ शिक्षा की निरंतरता को प्रभावित कर सकती हैं, जबकि ऑफलाइन कक्षा इन बाधाओं से मुक्त है।
छात्रों की राय: “ऑनलाइन में टीचर से बात करने का मौका ही नहीं मिलता”
विद्यालय के अनेक छात्रों से बातचीत में एक जैसी भावना सामने आई—
ऑनलाइन पढ़ाई में शिक्षक से संवाद कम हो जाता है।
छात्रों ने कहा—
* “मोबाइल पर पढ़ाई में ध्यान भटकता है।
* टीचर से सवाल नहीं पूछ पाते।
* ऑफलाइन क्लास में जो समझ आता है, वह ऑनलाइन में नहीं आता।”
इस बात से स्पष्ट है कि ग्रामीण परिवेश में आज भी परंपरागत शिक्षण पद्धति छात्रों के लिए अधिक सहज, स्पष्ट और विश्वासपूर्ण मानी जा रही है।

डिजिटल बनाम पारंपरिक शिक्षा: असली सवाल क्या है?
भारत तेजी से डिजिटल शिक्षा की ओर बढ़ रहा है, लेकिन इस रिपोर्ट ने एक बड़ा प्रश्न खड़ा किया है—
क्या तकनीक शिक्षा को आसान बना रही है या शिक्षक-छात्र संवाद को धीरे-धीरे कम कर रही है?
ग्रामीण भारत के संदर्भ में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वहाँ—
* संसाधनों की कमी,
* नेटवर्क की समस्या,
* मोबाइल की सीमाएँ,
* और डिजिटल विचलन
शिक्षा की प्रभावशीलता को प्रभावित करते हैं।
श्रीनगर गांव का यह विद्यालय एक संदेश देता है—
तकनीक शिक्षा का साधन है, विकल्प नहीं।
और स्कूल केवल किताबों का नहीं, संस्कार और संवाद का भी स्थान है।
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