Ballia UP News: तेज़ रफ्तार डिजिटल युग, सिनेमा और ओटीटी के बढ़ते प्रभाव तथा बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं के बीच जब यह कहा जाने लगा था कि अब रंगमंच का भविष्य नहीं है, तब बलिया की साहित्यिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था “संकल्प” ने न केवल इस धारणा को चुनौती दी, बल्कि बीते बीस वर्षों में यह प्रमाणित किया कि रंगकर्म आज भी जीवित है, स्पंदित है और समाज को दिशा देने की क्षमता रखता है।

इस पूरी यात्रा के केंद्र में एक नाम लगातार दिखाई देता है—आशीष त्रिवेदी।
रंगकर्मी, चिंतक और संकल्प के संचालक के रूप में आशीष त्रिवेदी ने न केवल संस्था को दिशा दी, बल्कि कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी रंगमंच की लौ को बुझने नहीं दिया।
वर्षों पहले जब संकल्प की नींव रखी गई थी, तब न साधन थे, न संसाधन और न ही बड़े मंच। कभी खुले मैदान, कभी छोटे सभागार, तो कभी सीमित दर्शकों के बीच—रंगकर्मियों ने अभावों में भी अपने सपनों को जीवित रखा। आर्थिक कठिनाइयाँ, मंचीय सुविधाओं की कमी, दर्शक वर्ग का सिमटना और यह तर्क कि “अब कौन नाटक देखता है”—इन सबके बीच संकल्प का सफ़र संघर्ष की पाठशाला बन गया।
लेकिन यही संघर्ष संकल्प की पहचान भी बना।
जहाँ कई जगहों पर रंगकर्मी टूटकर बिखर गए, वहीं संकल्प ने हर चुनौती को एक नए प्रयोग में बदला। स्थानीय प्रतिभाओं को मंच दिया, युवाओं को रंगमंच से जोड़ा और यह भरोसा जगाया कि नाटक केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सामाजिक संवाद का सशक्त माध्यम है।

आज, अपने बीस वर्ष पूरे होने पर, संकल्प उसी विश्वास को और मजबूती से दोहराने जा रहा है।
26 से 28 दिसंबर 2025 तक मनोरंजन हॉल, टी.डी. कॉलेज (श्री मुरली मनोहर टाउन स्नातकोत्तर महाविद्यालय), बलिया में आयोजित होने वाला तीन दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य समारोह “संकल्प रंगोत्सव” केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि बीस वर्षों के संकल्प, साधना और संघर्ष का उत्सव है।
इस रंगोत्सव में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कलाकार अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से यह संदेश देंगे कि रंगमंच किसी एक शहर या संसाधन का मोहताज नहीं होता।
पटना से “अंधा युग”, दिल्ली से “रूप–अरूप”, जम्मू से एकल प्रस्तुति “मां मुझे टैगोर बना दे” और बलिया के अपने रंगकर्मियों द्वारा “चरणदास चोर”—ये सभी नाटक रंगमंच की वैचारिक विविधता और जीवंतता को सामने लाएंगे।
साथ ही ग़ज़ल, लोकगीत, रंग-संगीत, कला प्रदर्शनी और पुस्तक प्रदर्शनी इस आयोजन को पूर्ण सांस्कृतिक महोत्सव का रूप देंगी। यह वह मंच होगा जहाँ रंग, शब्द, संगीत और विचार एक साथ संवाद करेंगे।

इस अवसर पर बलिया की चार विशिष्ट सांस्कृतिक विभूतियों को ‘संकल्प सम्मान 2025’ से सम्मानित किया जाना भी इस बात का प्रमाण है कि संकल्प केवल मंचन तक सीमित नहीं, बल्कि कला-साधकों के सम्मान और सांस्कृतिक स्मृति के संरक्षण का भी कार्य कर रहा है।
आज जब कई लोग कहते हैं कि थिएटर अब इतिहास बन रहा है, तब संकल्प का बीस वर्षीय सफर यह कहता है—
“रंगमंच खत्म नहीं हुआ है, वह बस सच्चे संकल्प की तलाश में था।”
बलिया के सांस्कृतिक मानचित्र पर संकल्प ने यह सिद्ध कर दिया है कि यदि नीयत साफ़ हो, विचार जीवंत हों और समाज से संवाद बना रहे, तो रंगकर्म कभी समाप्त नहीं होता।
संकल्प रंगोत्सव उसी जीवंत परंपरा का उत्सव है—जहाँ अतीत का संघर्ष, वर्तमान की साधना और भविष्य की उम्मीद एक साथ मंच पर उतरती है।
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