Dussehra 2025: असत्य पर यह कैसी विजय, क्या सच में रावण मर गया, अमन दीक्षित कानपुर

Dussehra 2025: What kind of victory is this over falsehood? Is Ravana really dead? Aman Dixit, Kanpur

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Dussehra 2025: कानपुर/फर्रुखाबाद। दशहरा, जिसे विजयादशमी भी कहा जाता है, हमारे समाज में बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। इस दिन रावण का दहन करके यह संदेश दिया जाता है कि बुराइयाँ समाप्त हो जाएँ और धर्म और नैतिकता की स्थापना हो। परंतु आज के दौर में यह पर्व केवल उत्सव और मनोरंजन का साधन बनता जा रहा है। रावण दहन के पुतले जलते हैं, मगर समाज में व्याप्त रावण – यानी अपराध, दुराचार और नैतिक पतन – लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हर साल दशहरे पर लोग बड़े उत्साह के साथ रावण के पुतले फोड़ते और जला देते हैं। इसका उद्देश्य हमेशा यह रहा कि बुराइयों का नाश हो और अच्छाई की विजय हो। लेकिन वर्तमान समाज में यह प्रतीकात्मक क्रिया केवल दृश्य मनोरंजन बनकर रह गई है। लोग इसे देखने आते हैं, सोशल मीडिया पर फोटो और वीडियो डालते हैं, पर भीतर अपने जीवन या समाज में व्याप्त बुराइयों को बदलने का प्रयास नहीं करते।

पुराने समय में रावण महाज्ञानी, शक्तिशाली और नीति पालन करने वाला शासक था। वह भगवान शिव का उपासक था, विद्वान था, और शूरवीर भी। उसकी एक गलती – वासना के कारण सीता का हरण – उसे नाश की ओर ले गई। रावण के जीवन से हमें यह सीख मिलती है कि कोई भी व्यक्ति अपनी विद्वत्ता, शक्ति या संसाधनों के बल पर नैतिक पतन के मार्ग पर टिक नहीं सकता। यदि अहंकार और वासना हृदय पर हावी हो जाए तो विनाश निश्चित है। आज का समाज भी इसी तरह के रावणों से भरा है। पुराना रावण केवल एक व्यक्तित्व था, जबकि आज के रावण हर घर, गली, शहर और गाँव में विद्यमान हैं। अपराध, हत्या, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, रिश्वत और भ्रष्टाचार की संख्या लगातार बढ़ रही है। यह केवल पुलिस या कानून व्यवस्था का मुद्दा नहीं है, बल्कि समाज के नैतिक पतन का संकेत भी है।

हमारे दशहरे के पर्व में जलते पुतले यह दिखाते हैं कि बुराई का अंत हो गया। परंतु वास्तविकता यह है कि बुराई समाज में कहीं भी कम नहीं हुई। आज के “रावण” धूर्त, अहंकारी और क्रूर हैं। वह अपने लाभ के लिए किसी की भी हानि करने से नहीं हिचकिचाते। दहेज़ के लिए पत्नी को जलाना, महिलाओं का अपहरण, बलात्कार और बच्चों पर अत्याचार – ये केवल कुछ उदाहरण हैं। यह सब समाज में बड़े पैमाने पर घट रहा है। पुराने रावण ने अपने भीतर की इच्छाओं और अहंकार के कारण ही विनाश का मार्ग अपनाया। आज के रावण और भी खतरनाक हैं, क्योंकि वे केवल बाहरी शक्ति और कानून का इस्तेमाल करके अपने स्वार्थ साधते हैं। उनमें नैतिकता, ईमानदारी या धर्म के लिए कोई श्रद्धा नहीं है। परिणामस्वरूप, समाज में विश्वास और मानवता का संकट बढ़ता जा रहा है। रावण दहन का असली उद्देश्य केवल पुतले जलाना नहीं है। यह हमें अपने भीतर के रावणों – दोष, नकारात्मक भावनाओं और बुराइयों – को पहचानने और दूर करने की शिक्षा देता है। जब तक हम अपने भीतर के अहंकार, द्वेष, झूठ, कपट और वासना को नहीं मारेंगे, तब तक समाज में स्थायी परिवर्तन संभव नहीं है।

आपकी कविता “जलते पुतले पूछते…” इस संदेश को बहुत सुंदर ढंग से व्यक्त करती है। इसमें यह दिखाया गया है कि पुतले जलते हैं, पर असली रावण समाज में बढ़ते ही रहते हैं। हर वर्ष रावण का वध होता है, लेकिन मन में रावण कहीं और पनपता है। इसका अर्थ यही है कि बाहरी उत्सव केवल प्रतीकात्मक क्रिया है, जबकि असली युद्ध हमें अपने अंदर करना है। आज का समाज शिक्षित और जागरूक है, पर फिर भी बुराइयाँ बढ़ रही हैं। अपराध, दुष्कर्म, घरेलू हिंसा, भ्रष्टाचार, अनैतिक व्यापार – ये सभी आधुनिक रावणों के उदाहरण हैं। बच्चों और युवाओं पर इसका विशेष प्रभाव पड़ता है। यदि हम केवल रावण दहन के उत्सव में आनंद लेते रहेंगे और बुराइयों के खिलाफ वास्तविक प्रयास नहीं करेंगे, तो यह उत्सव खाली प्रतीक बनकर रह जाएगा। दशहरे का असली अर्थ तब पूरा होता है जब हम अपने भीतर के दोषों का संहार करें। झूठ, कपट, अहंकार, वासना और द्वेष – इन्हें पहचानकर दूर करना ही असली विजय है। यह केवल सामाजिक और नैतिक सुधार का मार्ग नहीं है, बल्कि व्यक्तिगत उन्नति का भी मार्ग है।Dussehra 2025: What kind of victory is this over falsehood? Is Ravana really dead? Aman Dixit, Kanpur

रावण का जीवन अत्यंत शिक्षाप्रद है। वह महाज्ञानी था, पर अहंकार और वासना के कारण विनष्ट हुआ। यही शिक्षा आज के समाज के लिए महत्वपूर्ण है। हमें यह समझना होगा कि बाहरी प्रतीक केवल मार्गदर्शन कर सकते हैं; वास्तविक परिवर्तन अंदर से होना आवश्यक है। समाज में बदलाव केवल व्यक्तियों के प्रयास से संभव है। माता-पिता, शिक्षक, समाज के वरिष्ठ लोग और नीति निर्माता सभी को मिलकर युवाओं और बच्चों में नैतिक शिक्षा, सदाचार और मानवता का बीज बोना होगा। तभी दशहरे का वास्तविक संदेश – बुराई पर अच्छाई की विजय – साकार हो सकता है।

यदि हम चाहते हैं कि रावण दहन का पर्व केवल जलते पुतलों तक सीमित न रहे, तो हमें अपने अंदर झूठ, कपट, अहंकार और द्वेष का अंत करना होगा। अपने समाज के भीतर व्याप्त अपराध और अनैतिकता पर विजय पाना होगा। तभी दशहरे का त्योहार न केवल उत्सव बनेगा, बल्कि वास्तविक रूप से समाज सुधार और नैतिकता का प्रतीक बनेगा।
आज के समय में रावण केवल एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि समाज में व्याप्त उन सभी बुराइयों का प्रतीक है जो रिश्तों, परिवार और सामाजिक जीवन को नुकसान पहुंचाती हैं। जब तक हम अपने भीतर और समाज में इन रावणों का संहार नहीं करेंगे, तब तक दशहरे का असली अर्थ खोता रहेगा।

अंततः यह केवल प्रतीकात्मक पर्व नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और सुधार का अवसर होना चाहिए। जलते पुतले हमें केवल याद दिलाते हैं कि रावण का अंत आवश्यक है, पर असली विजय अपने भीतर और समाज में व्याप्त बुराइयों पर तभी संभव है। अगर हम यह संदेश नहीं समझेंगे, तो दशहरे के हर साल रावण का वध केवल दृश्य बनकर रह जाएगा, और समाज में वास्तविक रावण बढ़ते रहेंगे

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