Ballia News: युवा कवि अभिषेक मिश्रा ने अपनी साहित्यिक यात्रा की प्रारंभिक चरण में लिखी गई अपनी दूसरी कविता को एक बार फिर नए अंदाज़ में पाठकों के बीच प्रस्तुत किया है। कविता “है प्रार्थना ये ईश्वर से मेरी, कि मुझे फल दे मेरी मेहनत का” आज भी उतनी ही प्रभावशाली प्रतीत होती है, जितनी अपने आरंभिक रचनाकाल में थी।
हालांकि अभिषेक मिश्रा अब तक कई नई कविताएँ, गीत और विचारपूर्ण रचनाएँ लिख चुके हैं, लेकिन उनका कहना है कि यह कविता न केवल उनके मन के सबसे करीब है और आज भी उनके जीवन-दर्शन को सबसे सटीक रूप में व्यक्त करती है, बल्कि आज की युवा पीढ़ी को यह संदेश भी देती है कि सफलता शॉर्टकट नहीं, निरंतर प्रयास का परिणाम है।
लेखक के भाव
कवि अभिषेक मिश्रा कहते हैं कि यह कविता उनके निजी जीवन के संघर्ष, सपनों और उस विश्वास से जन्मी है जिसमें ईश्वर से माँगने से पहले कर्म को सर्वोपरि रखा गया है।
वे बताते हैं—
“यह कविता मेरी शुरुआती रचनाओं में दूसरी थी, लेकिन इसका भाव आज भी मेरे लिए उतना ही ताज़ा है। मैं इसे दोबारा इसलिए दुनिया तक पहुंचा रहा हूँ क्योंकि यह मुझे मेरी जड़ों, मेरी मेहनत और मेरी सोच की शुरुआत की याद दिलाती है।
मैंने हमेशा माना है कि जो फल मेहनत से मिलता है उसका स्वाद ही अलग होता है। इस कविता में मेरी वही भावना है कि ईश्वर भी उसी का साथ देते हैं जो कर्मपथ पर चलता है। मेरी कलम का लक्ष्य यही है कि युवाओं में सकारात्मकता, विश्वास और कर्मशीलता की भावना बनी रहे।”
वे मानते हैं कि किसी भी लेखक के भीतर कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं जो उम्र के साथ और भी अधिक गहराई से समझ में आती हैं—यह कविता उन्हीं में से एक है।
कविता का संदर्भ
यह कविता उन युवाओं और विद्यार्थियों को समर्पित है जो संघर्षों से घिरे होने के बावजूद निरंतर प्रयास कर अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। कविता मेहनत, निष्ठा, कर्म और आत्मनिर्भरता की भावना को केंद्र में रखकर लिखी गई है। लेखक ने इसमें यह संदेश दिया है कि—
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फल की याचना से पहले कर्म होना चाहिए,
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कलम सृजन का माध्यम है और पहचान देने वाली शक्ति,
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और जीवन में वास्तविक आनंद वही है जो अपनी मेहनत से मिले।
कवि ने सहज भाषा में उस वास्तविक जीवन दर्शन को लिखा है जिसे हर मेहनती इंसान दिल से महसूस करता है।
कविता: ईश्वर से प्रार्थना
है प्रार्थना ये ईश्वर से मेरी, की मुझे फल दे मेरी मेहनत का,
लाखों की भीड़ है मांग रही, तुझसे फल अपने बिन मेहनत का।
है प्रार्थना ये ईश्वर से मेरी, कि मुझे फल दे मेरी मेहनत का।
नहीं आता हूं तेरे दर पर मैं, क्योंकि व्यस्त हूं अपने कार्यों में,
मेहनत करता निष्ठापूर्वक, जिस कार्य में व्यस्त मैं रहता हूं,
यदि कर्म से मैंने मुख मोड़ लिया, तो तुम मुझसे रूठ जाते हो,
यदि कर्म को अपना मान लिया, तो तुम खुद मेरे हो जाते हो।
है प्रार्थना ये ईश्वर से मेरी, कि मुझे फल दे मेरी मेहनत का।
जिस कलम से हूं यह लिख रहा, उस कलम को इतना ताकत देना,
पन्ने कम पड़ जाए लिखने से, पर मेरे कलम को तुम जिंदा रखना,
है उम मेरी छोटी ही सही, पर दिखाना है इस कलम की पहचान मुझे,
हूं इसी उम्मीद से कलम घिसता, कि इस कलम से हों पहचान मेरी।
है प्रार्थना ये ईश्वर से मेरी, कि मुझे फल दे मेरी मेहनत का।
वो जीवन ही क्या जीवन है, जो गुजारा हमने दूसरों के दम पर,
होगा फक्र अपने जीवन पर, जब हासिल करूं कुछ अपने बल पर,
बिन कोशिश कि फल प्राप्ति का, आनंद नहीं है उस जीवन का,
उस फल का है आनंद अलग ही, जिसे पाया हो अपनी मेहनत का।
है प्रार्थना ये ईश्वर से मेरी, कि मुझे फल दे मेरी मेहनत का।
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