UP NEWS: फागुन फिर आ गया है। हवा में वही नरम गर्माहट है, पेड़ों पर वही नई कोपलें हैं और बाज़ार में रंगों की वही सजी-धजी दुकानें… सब कुछ वैसा ही है, बस एक चीज़ छोड़कर। इस बार भी होली में ‘वो’ नहीं है जो हमें खींचकर चौपाल तक ले जाता था। सच तो ये है कि अब होली आती नहीं है, बल्कि बस कैलेंडर की एक तारीख बनकर गुज़र जाती है। कभी फागुन खुद आकर कान में कह देता था—”तैयार हो जाओ, मैं आ गया हूँ।” अब मोबाइल का नोटिफिकेशन बताता है कि आज ‘हैप्पी होली’ का स्टिकर भेजना है।
कहाँ खो गया वो ‘जोगिरा’ और चौपाल की वो तान?
याद करिए, जब गाँव की शाम ढलती थी और झाँझ-मजीरे की खनक के साथ गूँजता था— “जोगिरा सरररररररा!”। वो सिर्फ एक शोर नहीं था साहब, वो एक ‘विरेचन’ था। वो ‘सरररररा’ साल भर के कलेजे के बोझ, ऊंच-नीच के भेदभाव और आपसी रंजिशों को हवा में उड़ा देने वाली एक आवाज़ थी। जोगिरा का अर्थ ही यही था— ‘जोगी जैसा वैराग्य’। यानी सब भूलकर, फकीर होकर बस आनंद में डूब जाना।
गाँव की उस अल्हड़ मस्ती में जब कोई बीच से बोलता था:
“ताल मिले तो ताल बजाओ, न ताल मिले तो ताली,
बुरा न मानो होली है भाई, फागुन दे न खाली…
जोगिरा सरररररररा!”
ये तुकबंदियाँ सिर्फ मनोरंजन नहीं थीं, ये दिल की गाँठें खोलने का तरीका थीं। आज हमने सलीके के चश्मे पहन लिए हैं, इसलिए हमें वो ‘फगुआ’ अब शोर लगता है। हमने संगीत तो बचा लिया, पर वो ‘साझा सुर’ खो दिया जो बिना किसी माइक के पूरे गाँव को एक धागे में पिरो देता था।
वो फाग की यादें… जो अब सुनाई नहीं देतीं
पहले जब ढोलक पर थाप पड़ती थी, तो पूरा टोला एक सुर में गा उठता था— “होली खेलें रघुबीरा अवध में…” या फिर वो करुण और मादक तान— “फागुन निठुरा मोर सखा रे, कासे खेलूँ मैं फाग?”। उन गीतों में बिरहा भी था और मिलन की आस भी। गाँव के बुजुर्ग जब गालियों के बीच से जीवन की गहरी बात कह जाते थे:
“हाथ में रंग, मन में कपट, कैसी ये चतुराई?
बाहर से तो रंग गए, पर भीतर रही जुदाई…
गिरा सरररररररा!”
आज के डीजे (DJ) वाले शोर में वो गीतों की रूह कहीं कुचल गई है। अब न वो लालचन चाचा जैसे फगुआ गाने वाले बचे हैं, न ही वो सुनने वाला धैर्य। हमने शोर तो बढ़ा लिया, पर वो ठहराव खो दिया जो रूह को रंग देता था।
रंग से पहले ‘लोग’ होते थे, अब बस ‘दिखावा’ है
गाँव की होली में ‘सभ्यता’ कम थी, पर सच्चाई बहुत थी। कीचड़ में गिरा देना, जबरदस्ती रंग मल देना और फिर हँसते-हँसते गले लग जाना—उसमें कोई बनावट नहीं थी। आज की होली ‘कंट्रोल्ड’ है। रंग लगाने से पहले हम सोचते हैं कि सामने वाला क्या सोचेगा? पहले दरवाज़े खुले रहते थे और मोहल्ले की टोली एक घर से दूसरे घर हमला बोलती थी। अब दरवाज़े भी बंद हैं और लोग भी। हमने तहजीब तो बचा ली, पर वो बेपरवाही खो दी जिसमें सच्चा अपनापन बसता था।
“काहें को गुलाल, काहें को रोली?
जब मन ही न भीगा, तो काहें की होली!”
माँ के आंचल से छनती गुझिया की वो सौंधी खुशबू
आज हम हलवाई की दुकान से डिब्बा-बंद गुझिया ले आते हैं, पर वो स्वाद कहाँ से लाएँ? याद आती है वो रसोई, जहाँ माँ और चाचियाँ हफ़्तों पहले से खोआ भूनती थीं। उस साझी रसोई में होने वाली गपशप, सांचे से कटी गुझिया और कड़ाही से उठती वो खुशबू जो पूरे मोहल्ले को बता देती थी कि ‘त्यौहार घर आ गया है’। हमने स्वाद तो डिब्बों में पैक कर लिया, पर वो ‘इंतज़ार’ खो दिया जो रिश्तों में मिठास घोलता था।
होली कहीं गई नहीं, हम ही दूर चले गए…
बार-बार दिल पूछता है कि “पहले जैसी होली कहाँ चली गई?” पर जवाब कड़वा है—होली कहीं नहीं गई, हम ही उससे दूर चले गए। हमने समय नहीं खोया, हमने वो लोग और वो सहजता खो दी जिनके साथ समय ‘रुक’ जाता था। इस बार अगर सच में होली मनानी है, तो गुलाल खरीदने से पहले एक वो रिश्ता उठाइए जो बरसों से धूल खा रहा है।
“अबीर उड़े तो आँखें बंद, मन की परतें खोलो,
इस बार रंगों से नहीं, बस प्रेम की भाषा बोलो…
जोगिरा सरररररररा!”
इस बार ‘स्टेटस’ मत लगाइए, किसी के दरवाज़े पर दस्तक दीजिए। इस बार रंग कम लगाइए, पर ‘गले’ ज़रूर लगाइए। क्योंकि साहब, गुलाल तो शाम को धुल जाएगा, पर जो ‘अपनापन’ मन पर चढ़ गया, वो ताउम्र नहीं उतरेगा।
उठिए, कि फागुन फिर से बुला रहा है। दरवाजा खोलिए, कहीं बाहर खड़ा आपका ‘बचपन’ और वो ‘जोगिरा’ आपका इंतज़ार कर रहे हैं।
लेखक परिचय एवं उद्देश्य
लेखक: अभिषेक मिश्रा
मूल स्थान: चकिया, बलिया (उत्तर प्रदेश)
अभिषेक मिश्रा का व्यक्तित्व और उनकी सोच उसी ‘बलिया’ की सोंधी मिट्टी और चकिया गाँव की बेबाक सादगी में रची-बसी है। उनका बचपन उन गलियों में बीता है जहाँ होली का मतलब कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि फागुन की आहट पर धड़कता हुआ पूरा गाँव था। आज महानगर की इस ‘कंट्रोल्ड’ और दिखावे वाली होली के बीच खड़े होकर, अभिषेक की आँखें अक्सर भीड़ में उस ‘साझा सुर’ और ‘जोगिरा’ की उस गूँज को ढूँढती हैं, जो कभी उनके गाँव की चौपालों की जान हुआ करती थी।
लेखन का भाव: शहर की भीड़ में गाँव की पुकार
अभिषेक के लिए यह लेख सिर्फ शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि एक ‘आत्मीय पुकार’ है। शहर की इस बनावटी और ‘हैप्पी होली’ वाली संस्कृति में, जहाँ रंग लगाने से पहले इजाज़त और औपचारिकता की दीवारें हैं, वे उस चकिया की होली को याद करते हैं जहाँ प्रेम बेपरवाह था।
लेखन का मूल उद्देश्य: अभिषेक इस लेख के माध्यम से उन ‘स्मृतियों’ को पुनर्जीवित करना चाहते हैं जो आधुनिकता की धूल में दब गई हैं। वे चाहते हैं कि पाठक इस लेख को पढ़कर सिर्फ यादों में न खो जाएँ, बल्कि अपने भीतर के उस ‘चकिया’ को ज़िंदा करें, जहाँ रिश्तों में गुलाल से ज्यादा ‘गरमाहट’ और शब्दों से ज्यादा ‘अपनत्व’ था। उनका मानना है कि जब तक हम अपने अहंकार की ‘होलिका’ नहीं जलाते, तब तक फागुन का असली रंग हमारे मन पर चढ़ ही नहीं सकता।
“शहर के फ़िल्टर वाले रंगों में, वो बलिया वाली बात कहाँ,
बिना यार के हुड़दंग वाली, फागुन की वो रात कहाँ…
जोगिरा सरररररररररररररररा!”
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Author: Abhishek Mishra
अभिषेक मिश्रा , यूपी तक न्यूज़ में एक सीनियर पत्रकार व एक प्रशिद्ध कवि भी हैं। वे काव्य और क्राइम, सोशल और पॉलिटिक्स से जुड़ी खबरें बनाते हैं। मीडिया में उन्हें 1 साल का अनुभव है। ये करीब एक साल से UP Tak News Media Publication (Digital) के यूपी/उत्तराखंड टीम में कार्यरत हैं। और ये खासकर बलिया जनपद से जुडी रिपोटिंग करते है।