Lucknow News: तिरस्कार, भूख और अपने लोगों से दूर होने का दर्द; ट्रांसजेंडर कथक नृत्यांगना देविका की संघर्ष की कहानी आपको झकझोर कर रख देगी

Lucknow News: The pain of rejection, hunger, and estrangement from loved ones—the story of transgender Kathak dancer Devika’s struggle will deeply move you.

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Lucknow News: देविका देवेंद्र एस. मंगलमुखी ने वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार प्राप्त किया है।

Lucknow News: कथक नृत्य की विधा में कई महान हस्तियों के नाम शामिल हैं। इनमें से एक नाम ऐसा है, जिसकी संघर्ष की कहानी हर किसी के लिए प्रेरणादायक है। यह नाम है देविका देवेंद्र एस. मंगलमुखी, जो किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। वे संगीत नाटक अकादमी द्वारा वर्ष 2025 का प्रतिष्ठित उस्ताद बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार प्राप्त कर चुकी हैं। उनका सफर वास्तव में हैरान करने वाला है। देविका ट्रांसजेंडर हैं और जब वे 14 वर्ष की थीं, तब उन्होंने घर छोड़ दिया था। देविका ने भीख भी मांगी, लेकिन उन्होंने जो सपना देखा था, उसे पूरा किया।

Lucknow News: सम्मान मिलने पर भावुक हो गयीं देविका

राष्ट्रीय सम्मान मिलने पर देविका अत्यंत भावुक हैं। उनका कहना है कि यह गर्व की बात है कि पहली ट्रांसजेंडर को बिस्मिल्लाह खान युवा पुरस्कार प्राप्त हुआ है। वे कहती हैं, मैंने कभी नहीं सोचा था कि सड़कों पर भीख मांगने वाली एक बच्ची एक दिन राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित होगी। यह सम्मान केवल मेरा नहीं, बल्कि पूरे ट्रांसजेंडर समुदाय का सम्मान है। देविका का कहना है कि समाज में लंबे समय से यह धारणा रही है कि संगीत और कला केवल पुरुषों या महिलाओं की दुनिया है, लेकिन यह सम्मान उस सोच को तोड़ता है। संगीत, नृत्य और कला किसी की बपौती नहीं है। यह सम्मान ट्रांसजेंडर समुदाय को मिला है और मुझे लगता है कि इसने सदियों पुरानी सामाजिक धारणाओं को भी चुनौती दी है।Lucknow News: The pain of rejection, hunger, and estrangement from loved ones—the story of transgender Kathak dancer Devika’s struggle will deeply move you.

Lucknow News: देविका को 14 साल की उम्र में घर छोड़ना पड़ा

देविका कहती हैं कि उनकी जिंदगी कभी भी सरल नहीं रही। जब वे 14 वर्ष की थीं, तब उन्हें घर छोड़ना पड़ा। वे उन सामाजिक मानदंडों के अनुसार नहीं जी सकती थीं, जिनमें उन्हें लड़कों की तरह रहने के लिए बाध्य किया जा रहा था। वे अपनी जिंदगी अपने नियमों के अनुसार जीना चाहती थीं।

Lucknow News: फेंका हुआ खाना खाकर पेट भरा

वह बताती हैं कि घर छोड़ने के बाद उन्हें भूख, तिरस्कार और असुरक्षा का सामना करना पड़ा। कई बार उन्हें कूड़ेदान में फेंके गए खाने को खाकर अपना पेट भरना पड़ता था। उन्होंने लोगों के ताने बाने और गालियां सुनीं। माता-पिता, परिवार और रिश्तेदारों से बिछड़ने का दर्द आज भी उनके भीतर है, लेकिन शायद यही संघर्ष उन्हें यहां तक लाने में मददगार रहा।

Lucknow News: रेलवे स्टेशन से शुरू हुआ संघर्ष

राजस्थान में जन्मी देविका जब घर छोड़कर दिल्ली आईं, तो उनके पास केवल 20 रुपये थे। उनका पहला दिन रोते हुए गुजरा, और दूसरे दिन उनके पैसे खत्म हो गए। इसके बाद उनकी मुलाकात ट्रांसजेंडर समुदाय के लोगों से हुई। दिल्ली के पटपड़गंज और हजरत निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के आसपास उन्होंने नई जिंदगी की शुरुआत की। देविका ने बताया कि शुरुआती दिनों में उन्हें भीख मांगनी पड़ी। वह रेड लाइट पर खड़े होकर पांच-दस रुपये मांगती थीं और शाम को पूरा पैसा अपने तथाकथित गुरु को देना पड़ता था। इसके बदले में उन्हें केवल दो वक्त की रोटी मिलती थी। एक घटना को याद करते हुए देविका कहती हैं कि एक दिन रेलवे स्टेशन पर इतनी भूख लगी थी कि किसी ने जो आधी पूड़ी फेंकी थी, उसे उठाकर खाना पड़ा। वह दृश्य आज भी उनके मन में ताजा है।

Lucknow News: पेट भरने के लिए किया हर काम

देविका बताती हैं कि उन्होंने जीवित रहने के लिए हर वह कार्य किया जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। रेलवे स्टेशन पर उनकी मुलाकात एक वाल्मीकि परिवार से हुई, जिसने उन्हें अपने साथ आने का निमंत्रण दिया। खाने के लालच में उन्होंने सफाई और अन्य छोटे-मोटे काम भी किए। देविका कहती हैं कि वे पढ़ाई में हमेशा अच्छी रही हैं और एक शिक्षित परिवार से आती हैं। उनके परिवार में राजनीति और शिक्षा दोनों का माहौल था, इसलिए हमेशा यह महसूस होता था कि जीवन में कुछ करना है, लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें अवसर नहीं दिया।

Lucknow News: कथक ने बदल दी देविका की जिंदगी

देविका बताती हैं कि नौवीं कक्षा में उनकी एक शिक्षिका कथक सिखाती थीं, और यहीं से उनके अंदर नृत्य के प्रति प्रेम का जन्म हुआ। कथक उन्हें विरासत में नहीं मिला, बल्कि यह उनके आत्मा का उपहार है। बाद में, उनकी मुलाकात गुरु श्री कपिल राज शर्मा से हुई, जिन्होंने उन्हें अपना नंबर दिया। लगभग दो साल बाद, उन्होंने उनसे संपर्क किया और फिर लखनऊ आकर कथक सीखना शुरू किया। वे हमेशा क्लास की आखिरी पंक्ति में खड़ी रहती थीं और घंटों तक आईने के सामने रियाज करती थीं। करीब 20 वर्षों की साधना ने उनकी जिंदगी को बदल दिया। आज जो सम्मान उन्हें मिला है, वह उन वर्षों की तपस्या का फल है।

Lucknow News: अब ट्रांसजेंडर समाज के लिए करना है काम

राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त करने के बाद, देविका इसे एक नई जिम्मेदारी के रूप में देखती हैं। उनका कहना है, मुझे लोगों ने नहीं, बल्कि कला प्रेमियों ने जीवित रखा। अब मैं प्रयास करूंगी कि ट्रांसजेंडर समुदाय के बच्चों को कथक सिखा सकूं। आज एक देविका को यह सम्मान मिला है, और कल हमारे समाज की दस और देविकाओं को भी यह सम्मान मिले, इसके लिए मैं मेहनत करूंगी। उन्होंने कहा कि वह अपने समाज से यह संदेश देना चाहती हैं कि भीख की जंजीरों को तोड़ें, और अपनी पहचान बनाएं। हमारे अंदर भी प्रतिभा है और हमें अपने कौशल के बल पर आगे बढ़ना चाहिए। देविका मंगलमुखी इस समय उत्तर प्रदेश विधान परिषद की संसदीय कार्य समिति की सदस्य हैं और भाजपा में राजनीतिक रूप से सक्रिय हैं।

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