UP Politics: उत्तर प्रदेश की राजनीति में आगामी 2027 के विधानसभा चुनावों के मद्देनजर ब्राह्मण मतदाता एक बार फिर सबसे बड़े केंद्र बिंदु के रूप में उभर रहे हैं। राज्य की कुल आबादी में लगभग 12 से 14 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाला यह समुदाय उत्तर प्रदेश की करीब 115 से 120 सीटों पर सीधा चुनावी प्रभाव डालता है। पूर्वांचल के कुछ जिलों में तो इनकी आबादी 20 प्रतिशत तक आंकी जाती है। यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रभाव वाले इस पारंपरिक वोट बैंक को अपने पाले में लाने के लिए समाजवादी पार्टी (SP) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) दोनों ने अपनी रणनीतिक बिसात बिछानी शुरू कर दिया है।
UP Politics: अखिलेश यादव की नई रणनीति: ‘पीडीए’ में ‘पंडित’ की एंट्री
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव अपनी पारंपरिक ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) राजनीति के दायरे को बढ़ाते हुए अब ब्राह्मणों को लुभाने के प्रयास में जुट गए हैं।
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जनेश्वर मिश्र जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन: सपा मुख्यालय पर आयोजित कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने ‘पीडीए’ के ‘पीडी’ का नया अर्थ ‘पंडित’ बताया है। उनका तर्क है कि समाजवादी पार्टी के एजेंडे में पंडित (ब्राह्मण) भी पूरी तरह शामिल हैं।
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प्रतीकात्मक और राजनीतिक दांव: सपा ने अयोध्या से पूर्व मंत्री पवन पांडेय को अपना पहला प्रत्याशी घोषित कर ब्राह्मण सम्मान का संदेश देने की कोशिश की है। इसके अलावा, पार्टी लगातार भाजपा सरकार पर कानून-व्यवस्था, विकास दुबे एनकाउंटर, और अटल बिहारी वाजपेयी के विजन की उपेक्षा जैसे मुद्दों को लेकर हमला बोल रही है।
UP Politics: भाजपा की पकड़ और ब्राह्मणों की वर्तमान स्थिति
90 के दशक के रामजन्मभूमि आंदोलन के समय से ही ब्राह्मणों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस से छिटककर भाजपा के साथ जुड़ गया था।
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योगी आदित्यनाथ का प्रभाव: मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की प्रखर हिंदुत्ववादी छवि, मजबूत कानून-व्यवस्था और सांस्कृतिक सरोकारों के कारण 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में ब्राह्मणों ने खुलकर भाजपा का समर्थन किया। 2022 में भाजपा के टिकट पर 46 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।
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सत्तारूढ़ दल से छिटकने की सुगबुगाहट: हालांकि, पिछले कुछ समय से यूजीसी गाइडलाइन्स, ट्रांसफर-पोस्टिंग में कम हिस्सेदारी और कुछ क्षेत्रीय पुलिस एनकाउंटर (जैसे बिहार का भरत तिवारी प्रकरण) के चलते ब्राह्मण समाज के एक वर्ग में असंतोष की चर्चाएं सतह पर आई हैं।
UP Politics: अखिलेश यादव की राह में आने वाली व्यावहारिक मुश्किलें
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केवल बयानों या सम्मेलनों के जरिए ब्राह्मणों को समाजवादी पार्टी के पाले में लाना आसान नहीं है:
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कोर वोटर का तालमेल: सपा के पारंपरिक कोर वोटर यानी यादवों और ब्राह्मणों के बीच सामाजिक धरातल पर नेतृत्व और वर्चस्व का पुराना टकराव रहा है। पार्टी के कुछ नेताओं के बयानों से भी यह संतुलन साधना मुश्किल हो जाता है।
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हिंदुत्व बनाम मुस्लिम समीकरण: सपा का एक बड़ा आधार मुस्लिम मतदाता भी हैं। दूसरी तरफ, ब्राह्मणों के लिए एक सीमा से अधिक हिंदुत्व-विरोधी या तुष्टीकरण से जुड़ी राजनीति स्वीकार करना कठिन होता है।
UP Politics: मायावती का पुराना दांव और बसपा की तैयारी
बहुजन समाज पार्टी (BSP) सुप्रीमो मायावती भी ब्राह्मण मतों को लेकर पूरी तरह सक्रिय नजर आ रही हैं।
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2007 का सफल प्रयोग: दो दशक पहले 2007 में मायावती ने ही ‘सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय’ का नारा देकर दलित, ब्राह्मण और अन्य जातियों के सामाजिक समीकरण के बल पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी, जिसमें 86 में से 41 ब्राह्मण विधायक जीते थे।
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वर्तमान रणनीति: 2027 के चुनाव के मद्देनजर मायावती ने भी अपने उम्मीदवारों के चयन में ब्राह्मणों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। जालौन की माधवगढ़ सीट से आशीष पांडेय को पहला उम्मीदवार बनाकर उन्होंने इस रणनीति के संकेत दे दिए हैं।
आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 इस बात की परीक्षा होंगे कि क्या अखिलेश यादव का ‘पीडीए’ विस्तार फार्मूला या मायावती का ‘सर्वजन समाज’ का पुराना जादू भाजपा के राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के मजबूत किले में सेंध लगा पाता है। फिलहाल, उत्तर प्रदेश का सियासी पारा ब्राह्मण वोटों के इसी समीकरण के इर्द-गिर्द घूम रहा है।
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Author: UP Tak News
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